कवायद

बालकों को आदमी बनाना

     "बहादुरी, एक के बदले दस , सख्ती से बालकों को आदमी बनाना, परिशुद्धता से सभी कौशल के साथ विकसित करने को कवायद कहा जाता है"

- - जी बी सामोट

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परेड के दौरान केडेट
     कवायद अनुशासन का आधार है| ऐसा कहा जाता है एवं इस वाक्य के तथ्य के करीब और कुछ भी नहीं हो सकता| ड्रिल स्क्वेयर की अक्सर पॉटर्स यार्ड से लाक्षणिक तुलना की जाती है, जिसमे मिट्टी की विभिन्न छटाएँ और ढाँचे को मिलकर अंत में कला के सराहनीय कार्य में आकार दिया जाता है, हर एक टुकड़ा अपने आप मे अद्वितीय है तथा पूरे का पूरा हिस्सा, उद्घोषणा करता है, “ धन्य हो प्रभु मेरे भगवान, जो मेरे हाथों के लिए लड़ाई , युद्ध के लिए मेरी उंगलिया, सतर्क, सावधानीपूर्वक और बलों में सर्वश्रेष्ठ माने जानेवाले व्यवस्थित संरक्षण ड्रिल प्रशिक्षणों द्वारा प्रदान की गयी है| धीरज , एकरूपता, सैन्य आचरण, आत्मसम्मान, टर्न आउट तथा सबसे महत्वपूर्ण बात आदेशों का निर्विवाद अनुपालन केडेटों के अच्छी तरह से संरचित तीन वर्षों में शासन के माध्यम से परीक्षण किया गया | फिर से वही कभी नहीं होगा| यह नेतृत्व डीके क्रूसिबल 400x150 मीटर खेत्रपाल परेड मैदान में फैला हुआ है जिसका नाम परमवीर चक्र विजेता , सेकंड ले अरुण खेत्रपाल (एफ स्क्वाड्रन /38 एन डी ए) जिन्होनें “ सेवा परमो धर्म:” का पालन करते हुए आत्म बलिदान दिया|

     आश्चर्य की बात नहीं है कि केडेटों की दृष्टि से एसिड टेस्ट पी टी या अकादमिक परीक्षाएँ नहीं है परंतु अधिक प्यारी एवम मुश्किल ड्रिल स्क्वेयर परीक्षा डी एस टी है| इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद वह दो “एल एस” मरून लेनयर्ड एवं लिबर्टी का हकदार हो जाता है जिसकी केडेट को उत्कट इच्छा होती है| सबसे महत्वपूर्ण बात, वह केवल “अकादमी नंबर” न रहकर ड्रिल के मूल स्तर प्राप्त कर “अधिकारी केडेट” के योग्य बन जाता है| ड्रिल एक व्यक्तिगत रेजिमेन से दूर, कड़ी मेहनत “ड्रिल प्रतियोगिता” प्रत्येक सत्र के दौरान की जाती है , सबसे बड़ी तथा आकर्षक स्क्वाड्रन प्रतियोगिता की ट्रॉफी के अलावा , विजेता को गर्व महसूस कराती है , शायद ही कोई अन्य प्रतियोगिता यह करा सके| यह उचित होगा कि तीन वर्षों के परिश्रम , लगन शिष्टता के उपरांत अकादमी द्वारा गौरवान्वित तथा इन्तजार करनेवाले अभिभावकों को प्रत्येक सत्र की पासिंग आउट परेड के बड़े अवसर पर ड्रिल स्क्वेयर का प्रदर्शन दिखा सके| केडेटों की आंखों में चमक तथा उनकी चाल में अभिमान के साथ वे उत्साह से 99 फीट 6 इंचेस के मास्ट आइ एन एस , दिल्ली क्वार्टर डेक से मार्च करते हुए अलविदा कहने के लिए तैयार होते है जो अब पौधे से पेड़ बन गए है| बॉय टु मेन में परिवर्तित हो गए हैं |

दंडपाल के चार्जेर्स



"“वफ़ादार चार्जेर्स की स्मृति मे,
जिन्होने मुस्तैदी से इस परेड मैदान की शोभा बढ़ाई”
खेत्रपाल परेड मैदान में घोड़े की अर्ध-प्रतिमा पर लिखे गए यह शब्द।
दंडपाल के यह ग्रे चार्जेर्स सभी पासिंग आउट केडेटों के लिए आकर्षण-बिन्दु रहे हैं|
यह ग्रे चार्जेर्स हैं:-
लाइमलाइट (जनवरी 1935 से अगस्त 1976)
पृथ्वीराज (अप्रैल 1968 एलएस अक्तूबर 1996)
रोमियो (सितम्बर 1978 से अगस्त 2001)
वारियर (नवम्बर 1995 से आज तक)

 
 
 
 
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