राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का इतिहास

An Iconic Institution in the Making


स्थायी घर का निर्माण होते हुए
     राष्ट्रीय रक्षा अकादमी प्रतिष्ठित संस्थान है, सैन्य प्रशिक्षण क्षेत्र में विश्व में उत्कृष्टता का प्रतीक है| कई वर्षों से इस अनूठे सैन्य अकादमी के रूप में उभरती हुई, हमारे देश के युवाओं एवं हमारे मित्र राष्ट्रों के भी युवाओं को आकर्षित करती रही है और उनको अधिकारियों एवं सज्जनों में परिवर्तित करती रही है| छः दशकों से अपने यशस्वी अस्तित्व में , राष्ट्रीय रक्षा अकादमी ने लालित्य और वैभव में वृद्धि की है तथा आरंभ से ही “ लीडर ऑफ मेन” उभरते आ रहे हैं जिन्होने अंतर सेवाओं में सौहार्द तथा संयुक्तता का प्रदर्शन दिया है| इस प्रकार से संस्थापक के विश्वास और दृष्टि को साबित किया है| लीडर्स ऑफ मेन के अलावा, भूतपूर्व छात्र उत्कृष्ट पर्वतारोही, अन्तरिक्ष यात्री, खिलाड़ी, शोधकर्ता, रचनात्मक लेखक, कलाकार, सामाजिक नेता तथा हाल ही में ओलंपिक विजेता भी साबित हुए है| उनकी उपलब्धियां हमारे सुरक्षा बलों मे तथा समाज में भी सभी स्तर पर प्रदर्शित एवं फैली हैं| “क्रेडल” वास्तव में, उदीयमान युवाओं को “नेता” बनाता है जो “सेवा परमो धर्म:” का पालन करती है|

     छह वर्षीय द्वितीय विश्व युद्ध उपरान्त यह महसूस किया गया कि आधुनिक युद्धपद्धति में ‘जाँईंटनेस’ की जरूरत है ताकि संघर्षपूर्ण स्थिति में उपलब्ध कराई जा सके, इस प्रकार एन डी ए स्थापना की कल्पना की गई थी। एन डी ए स्थापना के समय अद्वितीय तथा समय से अधिक अग्रसर रहा। वास्तव में, यह कल्पना काफी रोमांचक थी कि कई देश इसे रुचि से देखते थे कि यह कैसे बना है।


फील्ड मार्शल सर क्लाउड जे औचिनलेक
जी सी बी , जी सी आई ई, डी एस ओ, ओ बी ई
     अकादमी की स्थापना से पूर्व 1941 में सुडान सरकार ने भारत के वाइसराय, लॉर्ड लिनलिथगो को द्वितीय युद्ध में शहीद भारतीय सैनिकों के स्मारक के निर्माण के लिए एक लाख पाउंड उपहार में दिए थे। बाद में इसका उपयोग राष्ट्रीय रक्षा अकादमी का निर्माण करने के लिए किया गया था। 02 मई,1945 को एक समिति का गठन कमांडर –इन –चीफ, भारत फील्ड मार्शल सर क्लाउड जे आचिनलेक, जी सी बी , जी सी आई ई, डी एस ओ, ओ बी ई, की अध्यक्षता में किया गया जो ‘अॅक’ के नाम से जाने जाते है| जिसमें सशस्त्र बलों के अधिकारियों को संयुक्त रूप से प्रशिक्षण प्रदान करने की उपयुक्तता की जाँच पर बल दिया गया।

     समिति के सदस्यों में निम्नलिखित शामिल किए गए:-

          (क) जनरल स्टाफ के प्रमुख – चीफ ऑफ जनरल स्टाफ
          (ख) कमांडिंग अधिकारी रॉयल इंडियन नेवी
          (ग) कमांडिंग वायु अधिकारी, रॉयल इंडियन एयर फोर्स
          (घ) भारत सरकार के सचिव, युद्ध विभाग
          (ङ) भारत सरकार के शैक्षिक सलाहकार
          (च) सर मिर्जा मोहम्मद इस्माइल, प्रधानमंत्री, जयपुर राज्य
          (छ) राव बहादुर राव राजा नरपत सिंह, जोधपुर
          (ज) डा॰ अमरनाथ झा, कुलपति इलाहाबाद विश्वविद्यालय
          (झ) खान बहादुर मियां अफजल हुसैन, पंजाब विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति
          (ञ) डब्ल्यू एक्स मस्केरेनहस , प्रधानाचार्य, इंजीनियरिंग कॉलेज पूना
          (ट) ए ई फुट , हेडमास्टर, दून विद्यालय, देहरादून

     * डॉ॰ अमरनाथ झा को समिति के उप अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया। परियोजना का कार्य 16 माह 23 जुलाई 1945 से 12 नवम्बर 1946 तक चला।


पंडित जवाहरलाल नेहरू नींव रखते हुए

     15 अगस्त 1947 को अविभाज्य भारतीय सेना बलों के कमांडर-इन-चीफ द्वारा “अॅक” बंद किया गया तथा इस अनूठे अकादमी की परिकल्पना उनके द्वारा तकरीबन अठारह महीनों के लिए कोल्ड स्टोरेज में रखी गयी | परंतु, उत्साह उत्पन्न हुआ और अफसर संवर्ग यह खालीपन नहीं देख पाया| वास्तव में, अकादमी की स्थापना सर्वश्रेष्ठ आवश्यकता बन गयी| अंत में, 1947 को वह रिपोर्ट चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी को सौंपी गयी| अन्तरिम संयुक्त अंतर सेवा स्कन्ध के भारतीय सैन्य अकादमी, देहारादून में निर्माण के सुझावों को कार्यान्वयन के लिए स्वीकृत किया गया| समांतर रूप से, खड़कवासला में स्थायी युद्ध अकादमी की स्थापना की कार्रवाई का भी आरंभ हुआ और प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा 06 अक्तूबर 1949 को इसकी नींव रखी गयी|


श्री मोरारजी देसाई एन डी ए का उद्घाटन करते हुए


      01 जनवरी 1949 को, सशस्त्र बल अकादमी में सैन्य अकादमी प्राप्त की तथा भारतीय सैन्य अकादमी एवं संयुक्त सेना विंग की स्थापना हुई। संयुक्त सेना विंग में दो साल प्रशिक्षण प्राप्त करने के उपरान्त थलसेना के केडेट्स कमीशन प्राप्त करने से पूर्व दो साल के अतिरिक्त प्रशिक्षण के लिए सैन्य विंग में भेजे गए। नौसेना तथा वायु सेना के केडेटों डार्टमऊथ तथा नेवल यू. के. के क्रेनवेल में उन्नत प्रशिक्षण के लिए भेजे गए। 07 दिसम्बर 1954, को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की अंतरिम प्रक्रिया की कल्पना निश्चित हुई। 16 जनवरी 1955 को अकादमी का औपचारिक उद्घाटन किया गया।




खड़कवासला ही क्यों ?

      राष्ट्रीय रक्षा अकादमी पुणे शहर के दक्षिण –पश्चिम तथा बंबई राज्य सरकार द्वारा दान की गई 8022 एकड़ भूमि में से 7015 एकड़ जमीन खड़कवासला झील के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। अन्य प्रस्तावित स्थानों में मुंबई, बेंगलोर, देहरादून, बेलगाँव, देवलाली, नासिक, पुरी, सिकंदराबाद तथा विजाग शामिल थे।

     स्वास्थ्यप्रद जलवायु की स्थिति, सैनिकी प्रशिक्षण के लिए स्थान की उपयुक्तता, अरब सागर से निकटता, संयुक्त प्रशिक्षण केंद्र के संचालन का अस्तित्व नया ‘मौक‘ लैंडिंगपोत तथा खड़कवासला झील के किनारे, एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सिहंगढ़ किले से नजदीक , इन सबको ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की स्थापना के लिए पुणे शहर का चयन किया गया।

आपरेशन बदली


ऑपरेशन बदली
     देहरादून से खड़कवासला में स्थानांतरण के लिए उसे आपरेशन ‘बदली’ कोड नाम दिया गया। देहरादून शब्द व्युत्पत्तिशास्त्रमूल से “ डेरा-द्रोण” या “द्रोण के कैम्प” से लिया जाता है। सैनिकी ऐतिहासिक संदर्भ में प्रतीकों के बिना ऐतिहासिक कैम्प द्रोण से खड़कवासला में अकादमी का स्थानांनतरण संभव नहीं था। खड़कवासला मूला नदी के पश्चिमी वाटरशेड में सहयाद्री पर्वतमाल की तलहटी में बसी है।

     यह पुणे से 12 मील पर स्थित है जहाँ 200 वर्ष पेशवाओं ने राज किया। खड़कवासला सिंहगढ़ क़िले से नीले वादियों से अच्छादित है| सुप्रसिद्ध सिंहगढ़ क़िले की चोटी पर स्थित है जो किला तनजी मालुसरे, शिवाजी महाराज के पसंदीदा जिन्होने मुगलों से क़िले को प्राप्त किया, उनके नाम से पहचाना जाता है| विडंबना यह है कि , एन डी ए की शुरुवात प्राचीन कैम्प द्रोणा (महाभारत के पात्र) से और पुणे के नजदीक जा बसा| ऑपरेशन बदली की योजनाओं का स्तर तथा क्रियान्वयन इस आश्चर्यजनक तथ्य से आँका जा सकता है कि इस सम्पूर्ण क्षति के लिए केवल “ पाँच रुपए” व्यय किए गए|


एन डी ए का हवाई दृश्य

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