पीकाक बे


     पीकाक बे, खड़कवासला झील के उत्तर –पूर्व में स्थित है। यह वाटरमैनशिप प्रशिक्षण का केंद्र है। इस नयनरम्य बे का उपयोग केड़ेटों को सीमैनशिप प्रशिक्षण उपकरणों, नौकायन,विंड सर्फिंग, नौका–विहार, वेलर्स आदि प्रशिक्षण के लिए किया जाता है। इस क्षेत्र में मयूर बहुतायत में पाए जाने से इसका नाम पीकाक बे रखा है।बे में हिरन, बंदरों तथा कस्तुरी बिलाव इस तरह के अन्य जीवों का भी घर है।

 

     खड़कवासला झील 1863-1886 में मुला-मुठा नदियों के संगम – स्थान पर बनाया गया है। 1961 में पानशेत बांध क्षतिग्रस्त हुआ था। जिससे विनाशकारी बाढ़ पुणे शहर में आई थी । 1965 में पानशेत बांध का पुनःनिर्माण हुआ। खड़कवासला झील पुणे शहर को ताज़ा पानी की जरूरतों को पूरा करने के मुख्य जलाशयों में से एक है। झील की लंबाई 17 किलोमीटर एवं चौड़ाई 2 किलोमीटर है। झील का कुल जलग्रहण क्षेत्र 501 स्क्वेयर किलोमीटर और गहराई 40 फीट से 120 के बीच है।

     पीकाक बे में वार्षिक राष्ट्रीय अंतर्देशीय उत्तम सेलिंग चैंपियनशिप का आयोजन होता है। एन डी ए की कुछ सबसे रंगारंग प्रतियोगिताएँ तथा गतिविधियाँ यहाँ आयोजित की जाती हैं। इसमें 5 की॰मी॰ लंबी खुली झील तैराकी प्रतियोगिता, भूमध्य रेखा के पार का माँक समारोह, अंतर बटालियन बोट पुलिंग प्रतियोगिता शामिल है।


      जहाँ घाटियों के बीच मीठा गीत गाते पक्षियों का झुंड,
जहाँ लयबद्ध संगीत जैसी हवा साँस लेती है
जहाँ पानी के ऊपर जैसे सुखद हजार दर्पण चमचमाते हैं
जहाँ सभी प्रकृति है गवाह दैदीप्यमान शांति की

उस पीकॉक बे में हम आपका स्वागत करते हैं ...


 

     वाटरमैनशिप ट्रेनिंग सेंटर (डब्ल्यू टी सी) पीकाक बे एन डी ए में स्थित है तथा यह उचित है कि सशस्त्र बलों के उदीयमान अधिकारियों को, सिंहगढ़ किले जो अमर बहादुरी तथा कोंढाना किले की प्रेरक उपस्थिति में प्रशिक्षित किया जाता है।

     खड़कवासला झील का निर्माण 19 वीं सदी के दौरान पूर्व पुणे में पड़े गंभीर सूखे के कारण किया गया तथा फसल वृद्धि और सिंचाई के काम के लिए अभियंताओं को प्रेरित किया गया । ब्रिटिश सेना के कप्तान फाइफ आर ई ने खड़कवासला में उच्च स्तर के जलाशय की सिफारिश की और बाद में विस्तृत सर्वेक्षण और जांच को अंजाम दिया। इसलिए इस मानव निर्मित खड़कवासला झील को फाइफ झील भी कहा जाता है। भारत के सबसे पुराने बांधों में से एक इस झील का निर्माण 1869 में शुरू हुआ था और 65 लाख रु॰ की लागत से यह कार्य 1879 में पूरा किया गया।

     खड़कवासला बांध एक गुरुत्वाकर्षण बांध के रूप में बनाया गया है और 1.6 की मी लंबा है। इसकी ऊँचाई 35 मीटर हैं तथा 3000 घन फीट इसकी क्षमता है। यह बांध मुठा नदी पर निर्मित है, जहाँ अंबी और मोसे नदियों का संगम होता है, जिस पर पानशेत तथा वरसगाँव बांध बनाया गया है। खड़कवासला के बैकवाटर की लंबाई लगभग 22 की मी है और चौड़ाई एक चौथाई से एक की मी तक की हो सकती है। शहर की दिशा में खुलने वाले बांध के 11 द्वार है। बांध के छह सिंचाई आउलटेट है जो पुणे शहर के लिए पीने का पानी उपलब्ध कराते हैं और हवेली, दौंड, इंदापूर और बारामती के आसपास के गावों के लिए सिंचाई का पानी उपलब्ध कराते हैं।

     1961 में भारी बाढ़ के कारण बांध के नदी हिस्से का 120 मीटर भाग टूट गया जिसके कारण शहर में भारी मात्रा में बाढ़ आ गई| उसी की यादें शेड नं॰ एक पर लिखी गयी हैं। इस प्रकार बांध का पुननिर्माण 1962 में शुरू किया गया और 1969 में पूरा हुआ।


 

     पीकाक बे झील के उत्तर पूर्व ओर स्थित है और 1942 से वाटरमैनशिप का केंद्र रहा है। वर्तमान में एन॰ डी॰ ए केडेटों का सभी नौसना प्रशिक्षण यहाँ सम्पन्न होता है। यह झील सुप्रसिद्ध नाविकों जिन्होंने अपने देश के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय चैंपियनशिप     जीते हैं उनके लिए नर्सिंग ग्राउंड है। इस अकादमी के भूतपूर्व छात्रों ने एक राजीव गांधी खेल रत्न पुरुस्कार,एक तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरुस्कार सहित नौकायन के लिए कई अर्जुन और द्रोणाचार्य खेल पुरस्कार जीते हैं। इस प्रकार इस झील का शानदार अतीत है और हमें अत्यंत गर्व है कि हमारे केडेट इस परंपरा को जारी रखेंगे।


     सैर्लिंग क्लब की स्थापना 1955 में की गई थी और एशिया के एंटरप्राईज क्लास सैलिंग बोट्स में अधिकतम संख्या में है। यह क्लब केडेटों में नौकायन की कला का परिचय देकर प्रतिभा के उच्च स्तर तक पहुँचाता है। क्लब नैशनल इनलैंड एंटेर्प्राइज चैंपियनशिप तथा नैशनल आप्टिमिस्ट चैंपियनशिप जैसी   कई विभिन्न राष्ट्रीय चैंपियनशिप की मेजबानी करती है।


 

    विंड सर्फिंग क्लब 1984 में स्थापित किया गया | यहाँ,केडेट आरंभिक स्टार बोर्डस नामक महत्वपूर्ण व्यापक सर्फबोर्ड पर खुद को संतुलित करना सिखते हैं फिर अल्फ़ाबोर्डस नामक चिकनी सर्फ़बोर्ड में स्नातक बनते हैं।क्लब में ग्यारह स्टारर्बोर्डस तथा तीन अल्फ़ाबोर्डस है।


 

     वर्ष 1984 में रोइंग क्लब तथा कयाकिंग क्लब की स्थापना की गई।रोइंग क्लब में पहले केडेटों को शुरुवाती नौकों में प्रशिक्षित किया जाता है जो विस्तृत होती है तथा संतुलन करने के लिए आसान होती है। कयाकिंग क्लब में केडेटों को फ्लैट बाटम कायाकस सिंगल और डबल सीटों को जिन्हें के-1 और के-2 बुलाया जाता हैं उन पर मूल प्रशिक्षण दिया जाता हैं।


 

     वाटर स्कीइंग क्लब 1992 में स्थापित किया गया, जो केडेटों के बीच लोकप्रिय क्लब में से एक है। यह खेल धीरज और सहनशक्ति का परीक्षण करता है और दृढ़ संकल्प का एक अच्छा संकेत है। केडेट पानी में उतरने से पहले स्की परीक्षण करते हैं और जोड़ने वाली रस्सी  से स्पीड नाव में धीरे से उतरते है।


 

     वाटरमैनशिप ट्रेनिंग सेंटर (डब्ल्यू टी सी) मुख्य रूप से नवोदित नौसेना केडेटों को प्रशिक्षित करने और नौसेना जीवन से परिचय कराने के लिए उपयोग किया जाता है।एन डी ए से पास आउट होने से पहले केडेटों को नावों का उपयोग, सैलिंग, रोपें की हैंडलिंग, नौकायन, रोप के प्रकार आदि सिखाया जाता है। इस दिशा में, एन डी ए ने एक स्टोन फ्रीगेट ‘’टी एस रोनी पेरियर” का निर्माण किया है जिससे केडेट नाव के विभिन्न भाग समझ सकें, जहाज पर होने का अनुभव कर सकें, नौसेना पर्यावरण का अनुकरण कर  सकें।

 
 

     केडेटों को प्रोत्साहित करने के लिए नवीन  “दिल्ली ब्लाक “केडेटों को समायोजित करता है तथा झील के सौंदर्य में केडेटों को निर्देश प्रदान करने के लिए कक्षाओं का भी आयोजन किया जाता है।

 
 

     नए आर ओ आर/ओ ओ डब्ल्यू 05 प्रमुख बन्दरगाहों के साथ भारत तथा मलक्का के पैसेज के माध्यम से केडेटों के नौकायन के पहलुओं तथा समुद्र में जहाज़ द्वारा किए जाने वाले विभिन्न कार्रवाई से परिचित होने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए खरीदे जा रहे है| सिमुलेशन केवल केडेटों को व्यावहारिक अभिविन्यास के माध्यम से विषय को समझाने में सहायता प्रदान करना नहीं हैं , बल्कि समुद्र में नौकायन के दौरान मौसम की स्थिति से सामना करने एवं उन्हें समुद्री स्थिति से परिचित करना भी है|

 
 

     एन डी ए पुणे नौकायन का मुख्य संरक्षक है तथा नौकायन संघ के तत्वावधान में पुणे राष्ट्रीय अंतर्देशीय उद्दम चैंपियनशिप का आयोजन भी करता है। इस टूर्नामेंट में पूरे  भारत से 16 से अधिक डिफेंस तथा सिविलियन क्लब भाग लेते हैं। इस टूर्नामेंट का उद्देश्य पुणे तथा भारत में खेल के रूप में नौकायन का विकास करना है। इस दिशा में एन डी ए ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है,  जो इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि वर्ष 2010 में इस प्रतियोगिता में 32 टीमों ने भाग लिया।

    एन डी ए सैलिंग क्लब एशिया में सबसे बड़ा है जो नीचे की नौकाओं की तालिका से स्पष्ट होती है:-

No.
Items
Quantity
a)
 एंटरप्राइज क्लास बोट
60
b)
 लेजर क्लास बोट्स
09
c)
 420 क्लास बोट्स
04
d)
 डी के वेलर्स
12
h)
 वाटर स्कीज
24
i)
 सर्फ बोट्स
13
j)
 रॉ बोट्स
09
k)
 कयाकस
21
l)
 आप्टिमिस्ट क्लास बोट्स
06

     इस प्रकार क्लब के आयोजन का विस्तार और प्रशिक्षण बढ़ाने के लिए ‘स्लोपिंग जे टी’ का निर्माण पीकाक बे पर किया जा रहा है। इस जेट्टी का प्राथमिक उद्देश्य डब्ल्यू टी सी का सभी मौसम में कुशलता का उपलब्ध कराना है।

     एन डी ए ने ऐसे श्रेष्ठ नाविकों को प्रदान किया है जिन्होंने राष्ट्र के लिए तथा संस्थान के लिए भी ख्याति प्राप्त की है। भूतपूर्व छात्रों द्वारा प्राप्त कुछ विविध पुरस्कार निम्नानुसार हैं:-

द्रोणाचार्य पुरुस्कार

2002- कमांडर एच डी मोतीवाला

राजीव गांधी खेल रत्न पुरुस्कार

93-94 – कमांडर एच डी मोतीवाला, ले॰ कमांडर पी के गर्ग

अर्जुन पुरुस्कार

1970 - ले॰ कमांडर एस जे कौंट्राक्टर
1978 - कमांडर एस के मोंगिया
1982 - से. ले॰ फारुख तारापूर
1986 - ले॰ ध्रुव भण्डारी
1990 - ले. पी के गर्ग
1993 - कमांडर होमी मोतीवाला
1996 -  स्वर्गीय ले॰ कमांडर केली एस राव
2001 -  कमांडर आर महेश

     इस प्रकार एन डी ए ‘नेतृत्व की निर्माणशाला‘ का उद्देश्य है नवोदित नौसैनिकों को इस देश में प्रतिभावान बनाना|

 

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